महात्मा बुद्ध और गणिका आम्रपाली की कहानी : Mahatma Buddha and Amrapali Story in Hindi : Web Bharti

Mahatma Buddha and Amrapali Story in Hindi


एक समय की बात है, भगवान् बुद्ध अपने शिष्यों के साथ भर्मण करते हुए वैशाली नगर के वनविहार में पहुंचे ! उनके आगमन का समाचार सुनते ही पुरे नगर में बात फ़ैल गयी ! कुछ ही समय में मानों पूरा नगर उनके दर्शन के लिए उमड़ पड़ा ! महात्मा बुध्द से मिलने के लिए बड़े-बड़े व्यापारी, शिक्षक, समाजसेवी, अधिकारी और राजपरिवार से जुड़े सभी वरिष्ठ लोग भी उनसे मिलने के लिए आए ! वहाँ पहुंचे सभी लोगों की भावना यह थी, कि तथागत बुद्ध अपने शिष्यों के साथ उनके घर पहुंचे एवं भोज का आमंत्रण को स्वीकार करें ! 

भगवान् बुद्ध सभी के निवेदन को ध्यानपूर्वक सुन रहे थे और स्वभावगत मुस्कान के साथ आमंत्रण का आभार प्रकट कर रहे थे ! इसी क्षण वैशाली की एक गणिका आम्रपाली भी वहाँ पहुंची हुई थी ! लेकिन उसने बुद्ध की शिक्षा से प्रेरित होकर बहुत समय पहले ही अपनी गणिकवृत्ति को त्याग चुकी थी ! उसने भी बुद्ध को भोजन के लिए आमंत्रित किया तभी महात्मा बुद्ध ने उनके आमंत्रण को तत्काल ही उसे स्वीकार कर लिया ! और अगले ही दिन भिक्षुयों सहित उसके निवेश स्थान पर आने की सहमति भी दे दी !

बुद्ध के इस निर्णय से उसके एक शिष्य को यह बात अच्छी नहीं लगी कि इतने सारे वरिष्ठ लोगों के निवेदन करने के बावजूद भी बुध्द ने एक गणिका "आम्रपाली" का आमंत्रण को स्वीकारा ! उस शिष्य की दृष्टि में आम्रपाली सिर्फ एक गणिका थी जो घृणित कर्म से जुडी महिला थी ! जब वहां बुद्ध से मिलने आये सभी लोग चले गए तो उस शिष्य ने बुद्ध से प्रश्न किया, बुद्ध इतने सारे लोगों ने आपको भोजन के लिए आमंत्रण दिया फिर भी आपने इतने सारे लोगों के भोज को न स्वीकार कर एक गणिका "आम्रपाली" का आमंत्रण को क्यों स्वीकारा ? 

Mahatma Buddha and Amrapali Story in Hindi


बुद्ध ने बहुत ही सुंदर उत्तर दिया - माना कि वह एक गणिका थी लेकिन पश्चाताप की अग्नि में तपकर अब वह निर्मल हो चुकी है ! अगर कोई भी व्यक्ति इस निर्मलता को प्राप्त कर लेता है तो वह उनसे भी श्रेष्ठ हो जाता है ! जो भी ऐसे किसी घृणित कार्य से लीन न रहे हो ! ऐसे व्यक्ति का आमंत्रण स्वीकार करने में संकोच नहीं होना चाहिए ! 

जब तक कोई भी व्यक्ति बुरे कार्यों में संलग्न रहता है, तब तक उससे अधिक से अधिक दुरी रहें तो ठीक है ! लेकिन जो भी व्यक्ति बुरे कार्यों को छोड़ कर अच्छे कार्य की ओर बढ़ रहा हो तो उसे स्वीकार करने में कभी भी संकोच नहीं करना चाहिए ! इससे उसकी अच्छाई की ओर बढ़ने की भावना को अधिक से अधिक बल मिलता है !


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