बुद्ध की मूर्ति निर्माण हेतु श्रद्धापूर्वक दान : Mahatma Buddha Story in Hindi Web Bharti

mahatma buddha story in hindi


चीन के "चांग चू" नाम के प्रदेश में एक मठ था, जहाँ के एक महंत बहुत ही ज्ञानी और योग्य थे ! एक दिन की बात है उन्होंने अपने शिष्यों को मठ में बुलाया और उनसे कहा कि मेरे मन में भगवान् बुद्ध की एक प्रतिमा बनवाने की इच्छा हो रही है ! महंत बोले - इस कार्य के लिए आप सब घर-घर जाकर धन एकत्र कीजिए ! 

आप सभी को एक बात ध्यान रहे कि किसी से भी बलपूर्वक धन नहीं लीजियेगा ! जो व्यक्ति जितना धन अपनी इच्छा व ख़ुशी से दे, सिर्फ उसी से लीजियेगा ! शुभ कार्य के लिए किये गए धन संग्रह शुद्ध तरीके से ही होनी चाहिए ! सभी शिष्यों ने महंत की आज्ञा का पालन करते हुए सभी अलग-अलग दिशा में धन संग्रह के लिए निकल पड़े !

एक शिष्य को यात्रा के दौरान "तिन नू" नाम की एक बालिका मिली ! जिसके पास सिर्फ एक सिक्का था ! जब उसे भगवान् बुद्ध की प्रतिमा बनवाने हेतु धन संग्रह के बारे में पता चला तो उसने श्रद्धापूर्वक एकमात्र सिक्के को दान करने की इच्छा जतायी ! लेकिन शिष्य ने इस एक सिक्के को तुच्छ मात्र  समझकर लेने से इनकार कर दिया !

धन संग्रह प्रक्रिया पूरी होने के पश्च्यात सभी शिष्य धनराशि को लेकर मठ में पहुंचे ! महंत ने मूर्ति बनाने का कार्य आरम्भ करवा दिया किन्तु कठिन प्रयास के बाद भी भगवान् बुद्ध की प्रतिमा सम्पूर्ण बन कर पूरी नहीं हो पा रही थी ! किसी न किसी चीज़ की कमी होती जा रही थी इस बात पर महंत को संदेह होने लगा ! तभी महंत ने अपने शिष्यों से धन संग्रह के बारे में पूछा ! सभी शिष्यों ने एक-एक कर के अपने अपने अनुभव को बताया ! इसी दौरान जब बालिका "तिन नू" के बारे में पूरी बात को बताया तब महंत को सब ज्ञात हो गया ! 

इस बात से महंत अपने शिष्य पर बहुत ही अधिक नाराज हुए और उसे आदेश दिया कि वे उस बालिका के पास जाएँ और उससे क्षमा मांगते हुए उससे एकमात्र सिक्के को आदरपूर्वक ले कर आये ! शिष्य ने ऐसा ही किया ! उन्होंने उस एकमात्र सिक्के को मूर्ति में प्रयोग होने वाले धातु के घोल में सिक्के को आदरपूर्वक मिला लिया ! 

धातु के घोल में उस सिक्के को आदरपूर्वक मिलाने से  एक अति सुन्दरतम मूर्ति का निर्माण हो गया !

यह कथा श्रद्धापूर्वक दिए गए दान की महत्ता को प्रस्थापित करता है ! यह कथा हमें बताता है की दान भले ही अल्प मात्रा में हो या अधिक मात्रा में, अगर दान श्रद्धापूर्वक से दिया गया हो तो जरूर ही सार्थक रूप में प्रतिफलित होता है !

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