महात्मा बुद्ध के प्रिय शिष्य आनंद की जिज्ञासाओं का समाधान | सत्य के तीन पहलू : Web Bharti

mahatma buddha story in hindi


एक समय की बात है, भगवान् गौतम बुद्ध के पास एक व्यक्ति पहुंचा ! जब वे बिहार के श्रावस्ती के एक नगर में उपदेश दे रहे थे ! उस वक़्त भगवान बुद्ध सभी के शंकाओं का समाधान के लिए उचित मार्ग दर्शन दे रहे थे उन दिनों लोगों की भीड़ हमेशा लगी रहती थी ! 

उस भीड़ में से एक ने पूछा - क्या ईश्वर होतें है ? तभी बुद्ध ने उस युवक को एक टक देखते हुए बोले, "नहीं होते है !" तभी कुछ देर बाद एक दूसरे व्यक्ति ने दोबारा वही प्रश्न को दोहराया - क्या ईश्वर होते है ? इस बार भगवान् बुद्ध का उत्तर बिल्कुल ही अलग था ! उन्होंने बड़ी ही दृढ़ता के साथ कहा कि- "हाँ ईश्वर होते है !" संयोग तो देखिये उसी दिन एक और व्यक्ति ने भी यही प्रश्न पूछ लिया ! बुद्ध मुस्कुराये और मौन रहे ! कुछ भी नहीं बोले ! बुद्ध के मौन रहने को देख कर वह व्यक्ति जिस रास्ते आया था उसी रास्ते में निकल गया !

भगवान् बुद्ध के प्रिय शिष्य "आनंद" ने इन तीनों व्यक्तियों के द्वारा पूछे गए प्रश्न पर बुद्ध द्वारा दिए गए भिन्न-भिन्न उत्तर यह दृश्य को देख कर आनंद आश्चर्य में पड़ गए ! 

आनंद ने भगवान बुद्ध से पूछा- "भगवान्" दृढ़ता के लिए मुझे क्षमा करें ! मेरी अल्प बुद्धि बार बार यह प्रश्न कर रही है, कि एक ही प्रश्न के तीन व्यक्तिओं को भिन्न-भिन्न उत्तर देने का क्या अर्थ है ?  तभी बुद्ध ने आनंद से कहा कि महत्व प्रश्न का नहीं है, और न ही सत्य का सम्बन्ध इन शब्दों की अभिव्यक्तियों से है ! महत्वपूर्ण वह मन : स्थिति है जिससे हमारे अंदर प्रश्न पैदा होते है, उसे ध्यान में न रखा गया तो आत्मिक प्रगति के लिए क्या उपयुक्त है ! अगर इस बात की उपेक्षा की गयी तो सचमुच में ही सत्य के प्रति अन्याय होगा ! 

इस बात को और स्पस्ट करते हुए भगवान् बुद्ध ने कहा - प्रथम व्यक्ति जिसने प्रश्न किया था उसका प्रश्न आस्तिक था लेकिन उसकी निष्ठा कमजोर थी ! आस्तिकता उसके आचरण में नहीं थी, सिर्फ बातो तक ही सिमित थी ! वह सिर्फ अपने कमजोर विश्वास का समर्थन मुझसे चाहता था ! अनुभूतियों की गहराई में उतरने का साहस उस व्यक्ति में नहीं था ! इसलिए उसको हिलाना आवश्यक था ताकि उसे ईश्वर को जानने की सच में कोई जिज्ञासा है भी या नहीं इसलिए उसे "ईश्वर नहीं है यह कहना पड़ा" !

"दूसरा नास्तिक व्यक्ति था"! नास्तिकता एक प्रकार की छूत की बीमारी के जैसा होता है, जिसका उपचार नहीं किया गया तो यह दूसरों को भी संकर्मित कर देगा ! उसे अपनी मान्यता नास्तिक होने पर अहंकार और अपने नास्तिक होने पर अधिक ही विश्वास था ! इसलिए उसे समय से पहले तोडना जरुरी था ! अर्थात यही कारण है कि उसे कहना पड़ा "ईश्वर है" !

तीसरा व्यक्ति सीधा-साधा भोला-भाला था ! उसके निर्मल मन में किसी भी प्रकार का मत थोपना उसके ऊपर अन्याय ही होता ! मेरा मौन रहना ही उसके लिए उचित था, मेरे इस आचरण से उसकी सत्य की खोज के लिए मार्ग उसे प्रेरित करेगा और सत्य तक पहुँचायेगा !

महात्मा बुद्ध के इस उत्तर को सुन कर आनंद के मन में चल रही जिज्ञासा शांत हो गयी !

 

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