एक बार की बात है, उस गांव से एक साधु महात्मा जी गुजर रहे थे उन्होंने राजा के घमंडता का बखान सुन रखा था इसलिए राजा को सबक सीखाने के लिए सोचा ! तभी महात्मा जी तेजी से राजमहल की तरफ जाने लगे और बिना सिपाहियों की इजाजत के सीधे महल के अंदर प्रवेश कर गए ! राजा ने जब यह दृश्य देखा तो गुस्से से आग-बबूला हो गए और राजा ने कहा कि ये क्या उदंडता है, महात्मा जी, बिना मेरे सिपाहियों के और बिना मेरे इजाजत के अंदर आने का दुःसाहस कैसे किया ?
महात्मा जी ने बड़े ही विनम्रता से उत्तर दिया - मैं आज रात इस सराय में ठहरना चाहता हूँ ! यह बात सुन कर राजा को बहुत बुरा लगा, राजा ने कहा महात्मा जी ये मेरा राज महल है, कोई सराय नहीं है, आप कहीं और चले जाएँ !
महात्मा जी ने कहा - हे राजन, तुम्हारे से पहले यह राजमहल किसका था ? राजा ने उत्तर दिया - मेरे पिता श्री का ! तभी महात्मा ने पूछा तुम्हारे पिता श्री से पहले किसका था ? राजा ने कहा - मेरे दादा श्री का !
महात्मा जी ने मुस्कुराते हुए कहा कि - हे राजन, जिस प्रकार लोग सराय में कुछ देर ठहर कर चले जाते है ! उसी प्रकार ये राज महल भी है, जो कुछ समय के लिए तुम्हारे दादा श्री का था फिर तुम्हारे पिता श्री का हुआ ! और वर्तमान में कुछ समय के लिए तुम्हारा है, कल किसी और का हो जायेगा !
महात्मा जी ने कहा ये राजमहल जिस पर तुम्हे इतना घमंड है, ये सराय की भांति ही है, जहाँ कोई व्यक्ति कुछ समय के लिए आता है और फिर कुछ समय पश्चात चला जाता है ! महात्मा जी कि यह बात राजा को इतना प्रभावित किया कि राजा ने पूरा राजपाट और मान-सम्मान को छोड़ कर महात्मा के चरणों में गिर गए और महात्मा जी से क्षमा मांगने लगे और इस घटना के बाद राजा का सारा घमंड दूर हो गया फिर जीवन में कभी भी घमंड न करने की शपथ ले ली !
इस कहानी से हमें यह सिख मिलती है, कि जीवन में कभी भी अस्थायी रहने वाले चीजों पर घमंड नहीं करनी चाहिए ! इस नस्वर जगत में कुछ भी हमारा नहीं है और न ही कुछ तुम्हारा है !

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