महात्मा बुद्ध के उपदेश : Mahatma Buddha Story in Hindi : Web Bharti


एक समय की बात है, किसी प्रदेश में भयानक अकाल पड़ा हुआ था। यह देखकर महात्मा बुद्ध को बहुत ही दुख हुआ उन्होंने वहां के लोगों से कहा कि बहुत सारे लोग भोजन और कपड़ों के लिए तरस रहे हैं, उन सभी की सहायता करना हर मनुष्य का धर्म होता है। 

आप सभी से अनुरोध है, जो कुछ बन पाए वह अवश्य दान करें। भगवान् बुद्ध की यह बात को सुनकर वहां उपस्थित सभी लोग अपने-अपने घर बिना कुछ दिए चले गए लेकिन वहां उपस्थित एक गरीब व्यक्ति बैठा ही रहा !

उस व्यक्ति ने सोचा मेरे पास तो सिर्फ एक ही वस्त्र है, जो मैंने पहन रखा है, अगर मैं इसे उतार कर दे दूंगा तो मैं नंगा हो जाऊंगा। फिर उस व्यक्ति ने सोचा कि मनुष्य धरती पर बिना वस्त्र ही पैदा लेता है और बिना वस्त्र ही धरती को छोड़कर चला जाता है। 

ना जाने धरती पर ऐसे कितने साधु और सन्यासी हैं जो बिना वस्त्र के ही पूरा जीवन रहते हैं, तो क्या मैं बिना वस्त्र के नहीं रह सकता हूं ? ऐसा सोचते हुए उस व्यक्ति ने अपने वस्त्र को उतारकर बुद्ध को दे दिया भगवान बुद्ध ने इस दृश्य को देखकर बहुत ही प्रसन्न हुए और उसे आशीर्वाद दिया।

फिर वह व्यक्ति प्रसन्न होकर अपने घर की ओर चल पड़ा खुशी के मारे चिल्ला रहा था और बोल रहा था मैंने अपने आधे मन को जीत लिया। उसी वक्त सामने से राजा की सवारी आ रही थी उस गरीब व्यक्ति की बात सुनकर राजा ने उसे अपने पास बुलाकर पूछा कि तुमने अपने आधे मन को कैसे जीत लिया ? 

उस व्यक्ति ने भगवान बुद्ध द्वारा दुखी व्यक्तियों के लिए दान मांगने की बात बताई। उसने कहा पहले तो मेरा मन अपने वस्त्र को उतारने से इनकार किया लेकिन मैंने अपने मन को समझाया कि मनुष्य बिना वस्त्र के पैदा लेता है और बिना वस्त्र के ही स्वर्ग सिधार जाता है। अपने साथ कुछ भी नहीं लेकर जाता 

राजा ने उस व्यक्ति की बात को सुनकर बहुत ही अधिक प्रश्न हुआ। राजा ने अपने मोतियों की माला और कीमती वस्त्र उस गरीब व्यक्ति को दे दिए लेकिन उस व्यक्ति ने वह सब कुछ ले जाकर भगवान बुद्ध के चरणों में जाकर रख दिए। इस बात से बुद्ध ने उसे अपने हृदय से लगाते हुए कहा कि जो व्यक्ति दूसरों के लिए अपना सब कुछ दे देता है, उसकी बराबरी संसार में कोई नहीं कर सकता 

इस बात पर भगवान बुद्ध ने  एक उपदेश दिए - दाता दाता चले गए, रह गए अब कंजूस, दान मान समझे नहीं, लड़ने को तजबूत !!

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