महात्मा गौतम बुद्ध और अंगुलिमाल की कहानी जो जीवन में एक महत्वपूर्ण संदेश देती है : Web Bharti

Buddha aur Amrapali ki Kahani


मित्रों आज के इस लेख में महात्मा बुद्ध के दिए विचारों से सीखेंगे की जीवन में असंभव कुछ भी नहीं होता ! अगर जीवन में आपको लगने लगा है कि मैंने बहुत सारे बुरे कार्य किये है और अब इन गलतियों को सुधारा नहीं जा सकता है, तो एक बार आपको महात्मा गौतम बुद्ध के जीवन में घटित इस कहानी को एक बार जरूर पढ़नी चाहिए !

महात्मा गौतम बुद्ध और अंगुलिमाल की कहानी - Mahatma Gautam Buddha Story in Hindi 

एक समय की बात है महात्मा बुद्ध श्रावस्ती के निकट एक गांव में भिक्षाटन के लिए पहुंचें ! जैसे ही गांव के अंदर प्रवेश किया तो देखा कि पूरे गांव में जैसे सन्नाटा सा छाया हुआ है ! आस-पास दूर-दूर तक एक भी व्यक्ति नहीं दिखाई दे रहा था ! महात्मा बुद्ध गांव के द्वार पर जा-जा कर भिक्षाम देही कहता है, परंतु भीतर से कोई भी व्यक्ति बाहर नहीं आता ! फिर बुद्ध दूसरे द्वार पर जाकर भिक्षाम देही कहता है, लेकिन कोई भी दरवाजा नहीं खोलता, फिर बुद्ध तीसरे घर जाता है वहाँ भी यही सिलसिला होता है, तभी अचानक एक दरवाजा खुलता है जिससे एक वृद्ध व्यक्ति बाहर निकलता है और बुद्ध का हाथ पकड़ कर अंदर की ओर ले जाता है और बुद्ध से कहता है की क्षमा करें तथागत। 

वह व्यक्ति बुद्ध से कहता है इस वक़्त मैं बाहर नहीं जा सकता क्योकिं उंगलिमाल को श्रावस्ती की सिमा के अंदर देखा गया है | जिसके डर से सभी गांव वाले डरकर अपने घरों में छिप गए है और खिड़की दरवाजे बंद कर रखें है ! तभी तथागत बुद्ध ने उस व्यक्ति से पूछा ये अंगुलिमाल कौन है ? जिसके डर  से पुरे गांव वाले डरकर घर में छिपें हुए है, वृद्ध व्यक्ति कहता है कि उंगलिमाल एक खूंखार राक्षस है जिसके भय से सभी लोग अपने अपने घरों में छिपे हुए है ! उसके समीप जो भी मनुष्य मिलता है चाहे वह वृद्ध, बच्चा, स्त्री, पुरुष या सन्यासी कोई भी हो किसी को भी नहीं छोड़ता है | यहाँ तक की महाराजा प्रसन्नजीत के सैनिक भी इनसे डरते है ! बुद्ध ने उस वृद्ध व्यक्ति से पूछा आखिर वह राक्षस धन के लालच में ऐसा करता होगा ?

तभी वह व्यक्ति कहता है कि नहीं तथागत उसे धन का कोई लालच नहीं है | वह तो लोगों पर वार करता है, और उसकी उंगली काटकर उसे अपने गले की माला बना कर पहनता है इसलिए ही उसका नाम उंगलिमाल पड़ा और मैंने यहाँ तक भी सुना है कि जब उनके गले की माला में एक सौ उँगलियाँ पूरी हो जाने पर उनकी शक्तियां और भी ज्यादा प्रबल हो जाएगी !

महात्मा बुद्ध ने उस व्यक्ति से आभार प्रकट किया और कहा आपने मुझे उसके बारे में बता कर अच्छा किया फिर उस व्यक्ति ने बुद्ध से कहा की कृपया कर के आप बाहर नहीं जाइए क्योकिं वह राक्षस आपके ऊपर भी वार कर सकता है ! तभी बुद्ध ने कहा भय के कारण मैं अपनी रह छोड़ दूँ ऐसा मैंने पहले कभी नहीं किया ना आज करूँगा | अगर मुझे भिक्षा मांगते हुए देख लोगों के ह्रदय में शायद उंगलिमाल का भय कम हो जाये | फिर वह व्यक्ति कहता है कि वह राक्षस बहुत ही खतरनाक है, आप नहीं जाईये | बुद्ध ने कहा वह खतरनाक नहीं है बल्कि वह दुखी है और मुझे उसके पास जाना अति आवश्यक है ! इतना कह कर महात्मा बुद्ध वन की ओर निकल पड़े जहाँ अंगुलिमाल रहता था !

Buddha aur Angulimal ki Kahani


महात्मा बुद्ध के वन में पहुंचने पर वहां वन में चारों ओर सन्नाटा छाया हुआ था ! वहां दूर-दूर तक एक भी मनुष्य, पशु और पक्षी कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था लेकिन बुद्ध ने अपना मार्ग नहीं छोड़ा सीधा आगे बढ़ते रहे ! अचानक थोड़ी दूर जंगल में आगे बढ़ने के बाद उंगलिमाल बुद्ध के सामने आकर खड़े हो गए, उसका मुँह बहुत ही ज्यादा डरावना था कोई भी मनुष्य उसे देख कर आसानी से भयभीत हो सकता था ! उसके गले में एक अँगुलियों की माला थी और उसके चेहरे और हाथों में पुरे खून से सने हुए था ! उसका शरीर एक साधारण व्यक्ति के जैसा नहीं था उसे कोई भी देख ले तो उसके प्राण निकल जाये ऐसा बलसाली था इसके बाबजूद भी बुद्ध पर उसका किसी भी प्रकार का कोई असर नहीं हुआ !

महात्मा बुद्ध कुछ समय तक शांत मुस्कराहट मुख के साथ अंगुलिमाल की ओर देखते है और अंगुलिमाल के बगल से ही अपने मार्ग में आगे की ओर निकल पड़े ! यह दृश्य को देख कर अंगुलिमाल को समझ नहीं आ रहा था कि आखिर उसके साथ क्या हो रहा है ? वह मन ही मन सोचना शुरू कर दिया की आखिर ये भिक्षु कौन है जो मुझे देख कर भी नहीं डरा और मेरे सामने से निकल गया यहाँ लोग मुझे देख कर डर के मारे भाग जाते है और अपने प्राणों की भीख मांगने लगते है, लेकिन यह भिक्षु मुझे देख कर तनिक भी नहीं डरा ! मैंने आज से पहले अनेकों भिक्षु सन्यासियों को मारा है लेकिन आज तक इसके जैसा व्यक्ति नहीं देखा, जो मुझे ऐसे नजर अंदाज कर के आगे अपने मार्ग में बिना डरे बढ़ जाये !  हो सकता है इसने मुझ पर ध्यान न दिया हो या फिर हो सकता है अँधा हो जिसे दिखाई नहीं देता हो, फिर इसने कहा मुझे इससे क्या मुझे तो इसकी ऊँगली चाहिए जिससे मैं अपनी मालों में उँगलियों की संख्या पूरी कर सकूँ ! अंगुलिमाल ने बुद्ध को आवाज लगाते हुए कहा कि ए सन्यासी रुको लेकिन बुद्ध अंगुलिमाल की बातों को नजर अंदाज करते हुए आगे बढ़ता चला गया !

इस घटना को देखकर अंगुलिमाल को बहुत ही ज्यादा क्रोध आ गया ! गुस्से में इसने दोबारा आवाज लगाया ए सन्यासी रुको लेकिन बुद्ध ने उंगलिमाल की बांतों को नजर अंदाज करता गया और अपने मार्ग में आगे की ओर बढ़ता गया ! अंगुलिमाल ने तीसरी बार गुस्से में आवाज लगाया और बुद्ध की ओर बढ़ा तब बुद्ध रुक गए,  उंगलिमाल बुद्ध के समीप पहुँच कर कहता है कि मेरे आदेश का पालन क्यों नहीं किया, इतनी आवाज देने के बाद भी तू क्यों नहीं रुका ? 

महात्मा बुद्ध ने कहा मैं तो अपने ही स्थान पर पहले से ही रुक चूका हूँ, तब से तुम ही तो चलते जा रहे हो | इस बात से अंगुलिमाल को कुछ भी समझ नहीं आ रहा था कि बुद्ध क्या कह रहें है लेकिन इतना जरूर समझ में आ रहा था की सामने खड़ा सन्यासी उससे जरा सा भी डर नहीं रहा है | 

उंगलिमाल महात्मा बुद्ध पर चिल्लाते हुए पूछा, ए सन्यासी तुझे मुझसे डर नहीं लगता, मैं खूंखार राक्षस हूँ ! तभी बुद्ध कहते है नहीं, तुम राक्षस नहीं एक मानव हो ! बुद्ध की ये बात सुनकर अंगुलिमाल के हृदय पर लगा, पहली बार किसी ने उसे मानव कह कर सम्बोधित किया था लेकिन ये बात सुन कर भी नजर अंदाज करने का प्रयास किया और बुद्ध से पूछा ए सन्यासी तुमने ये क्यों कहा की तू कब का रुक चूका है, जबकि तू तो अभी भी चलता चला जा रहा था और तूने ये क्यों कहा कि मैं नहीं रुका था ? 

तभी बुद्ध ने उत्तर दिया - मैं पहले से रुक चूका हूँ इससे तात्पर्य है कि मैं सारे बुरे कार्य छोड़ दिया है जिससे किसी भी व्यक्ति को मुझसे किसी भी प्रकार का कष्ट पहुचे | यहाँ धरती पर सभी प्राणी जीना चाहते है बस तुम एक बार उन्हें करुणा के भाव से देखने का प्रयास तो करो ! 

बुद्ध के इस बात से अंगुलिमाल के ह्रदय पर दोबारा चोट लगा, लेकिन ये सुनने के बाद भी बुद्ध की बातों को नजर अंदाज करने का प्रयास किया और क्रोध में आकर बुद्ध के गर्दन पर अपना खंजर रखते हुए चिल्ला कर बुद्ध से कहता है कि मानव में न तो प्रेम होता है, और न ही करुणा की भावना ! मनुष्य के भीतर छल और कपट भरा होता है इसलिए मैं सभी की हत्या करूँगा किसी को भी जीवित नहीं छोडूंगा ! 

बुद्ध ने बड़ी ही विनम्रता से अंगुलीमाल को कहा - मैं  जानता हूँ , तुम्हे लोगों ने बहुत दुःख  दिया है। क्रूरता, मनुष्य के भीतर अज्ञानता के कारण  ही होता है। ईर्ष्या, द्वेष, मोह-माया, ये सब अज्ञानता के कारण  ही उत्पन्न होती है, परन्तु वह व्यक्ति जिसके अंदर दया, करुणा, सद्भाव और समझ विकसित होती  है ,वे बहुत ही सत्यवान होते हैं।  

बस तुम्हे भी यही करना होगा - अच्छाई और बुराई के अंतर को समझना होगा ,सत्कर्म की ओर  बढ़ना होगा। 
तीसरी बार बुद्ध  के शब्दों को सुनकर अंगुलीमाल का ह्रदय द्रवित हो गया। उसे समझ नहीं आया कि उसे इतना कमजोर क्यूँ महसूस हो रहा है। वह लाख कोशिश करने के बाबजूद भी क्रोध नहीं कर पा रहा था। परन्तु फिर भी अंगुलीमाल बहुत हिम्मत जुटाकर कहता है - तुम कोई साधारण आदमी नहीं हो, जरूर तुम कोई बहरूपिये हो। 

बुद्ध विनम्रता पूर्वक कहते हैं - मैं  भी एक साधारण वयक्ति ही हूँ बस मैं  लोगों के मन में दया, क्षमा और प्रेम का भाव जागृत करने का काम करता  हूँ। बुद्ध ने फिर समझाते हुए कहा -उंगलीमाल तुम अनजाने में घृणा के पथ पर हो, बस इस क्षण रुक जाओ। तुम्हारे भीतर  ये क्षमता है, कि तुम दया और करुणा के पथ पर चल सको। 

इतना सुनते ही उंगलीमाल के हाथ से खंजर जमीन पर गिर जाता है, और उसकी आंखों से आंसू बहने लगता हैं। अंगुलीमाल ने रोते  हुए बुद्ध से कहा- अब मैं भी मुक्ति के मार्ग में जाना चाहता हूँ।  मैंने बहुत पाप किये हैं। मुझे मुक्ति के मार्ग पर ले चलो। अब मैं  पाप मुक्त होना चाहता हूँ। मैं पाप के समुंद्र में बहुत ही दूर निकल गया हूँ। मुझे लगता है ,अब मैं  चाहकर भी वापस नहीं आ सकता हूँ।  मुझे माफ़ कर दीजिये । 

बुद्ध ने कहा - तुम व्यर्थ की चिंता करते हो , जब जागो तभी सवेरा है. आजतक तुमने जो कुछ भी किया अनजाने में किया है, अब तुम  अच्छे और बुरे में फर्क जान गये  हो।  जिस दिन तुम अपने सत्कर्मो और नैतिक आचरण से लोगों की भलाई करना शुरू कर दोगे , तुम्हे नव जीवन मिल जायेगा। 

अंगुलीमाल ने गिड़गिड़ाते हुए कहा -  प्रभु अब मैं  तुम्हारी शरण में आना चाहता हूँ , कृपा कर मुझे अपना शिष्य बना लीजिये ! तभी बुद्ध  ने अपने संघ में शामिल हो जाने की प्रेरणा दी और कहा  - मैं  तुम्हे शिष्य नहीं बना सकता ,तुम्हारे जैसे असंख्य  लोग इस संग में शामिल हैं, जिन्होंने अज्ञानता से प्रकाश की और कदम बढ़ाया है ! तुम भी वही करो, तब से वह संग के कामों में संलग्न रहने लगा उसकी लगन नेक कार्यों में लगने लगी। 

इस नेक कार्य  की वजह से अंगुलिमाल का नाम बदलकर अहिंसक कर  दिया गया। इतना कुछ होने बाद अब उसके परीक्षा की घडी आयी।अहिंसक अपने गांव जाता है, उसके गांव पहुँचते ही ग्रामीण उसे लाठी डंडे और पत्थरों से मारना शुरू कर देते हैं। लेकिन उसने कभी पलटवार नहीं किया। इस बात की खबर जैसे ही बुद्ध को मालूम हुई - उसने  आकर लोगों को समझाते हुए कहा कि अब  यह दानव से मानव बन चूका है, वैसा नहीं रहा  जैसा की तुम  सोचते हो।  इसका ह्रदय  परिवर्तन हो चूका  है।
 
बुद्ध ने समूची जनता से कहा - क्या यह बदलाव आपको नहीं दिख रहा है ? यह तो बदल गया, परंतु आप कब बदलोगे ? इस बात का लोगों के जीवन में इतना गहरा प्रभाव पड़ा कि सभी लोगों ने महात्मा बुद्ध को नतमस्तक किया और अहिंसक को क्षमा कर दिया। स्वयं में भी क्रोध को तिलांजलि देकर क्षमा भावना को विकसित  कर लिया। 

इस कहानी से हम सब को यही शिक्षा मिलती है, की - लोग सोचते हैं की उन्होंने बहुत सारे गलत काम किए हैं। अब इन गलत कामों को सुधारने का कोई विकल्प नहीं है। इस पर गौतम बुद्ध कहते हैं - कि चाहे आपने अब तक कितने भी बुरे काम क्यों न किए हों , लेकिन अगर आप एक अच्छे  विचार को अपने मन में लाते हैं, कि अब मुझे सत्कर्म के मार्ग पर चलना है, तो वही सदविचार आपके जीवन में रूपांतरण का कारण बन सकता है। पर सबसे जरूरी बात यह है, की क्या आप अपना पहला कदम उठाने के लिए तैयार हैं। 

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